लेखा रत्तनानी
केंद्र सरकार विशेष रूप से नॉर्डिक और यूरोपीय देशों में भारतीय दूतावासों के माध्यम से परामर्श और सहायता प्रदान करके हस्तक्षेप करती है तो इस कानून के आधार पर विदेश में काम करने वाले परिवारों के मामले में मदद मिल सकती है। भारतीय माता-पिता के लिए दूतावासों में एक प्रकार का पारिवारिक लोकपाल एक मार्गदर्शक तथा रेफरल बिंदु हो सकता है।
पिछले महीने भारतीय सिनेमाघरों में एक फिल्म रिलीज हुई थी जिसमें अपने बच्चों की कस्टडी वापस पाने के लिए एक अप्रवासी भारतीय मां के संघर्ष को बताया गया है। यह मां नॉर्वे की फोस्टर केयर सिस्टम से लड़ रही है। भारत में इस फिल्म का बॉक्स ऑफिस रिटर्न इतना उत्साहजनक नहीं रहा लेकिन यह नॉर्वे में सबसे अधिक देखी जाने वाली दक्षिण एशियाई फिल्म है। इस फिल्म में नॉर्डिक और यूरोपीय देशों में चाइल्ड केयर सेवाओं के खिलाफ ज्यादातर आप्रवासी पालकों के संघर्ष को दिखाया गया है। भारत स्थित नॉर्वे दूतावास ने सागरिका चक्रवर्ती की 2022 की किताब 'दी जर्नी ऑफ ए मदर' पर आधारित फिल्म को 'काल्पनिक प्रतिनिधित्व' बताकर खारिज कर दिया है। इस मामले को एक दशक पहले भारतीय अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद सुलझा लिया गया था। दूतावास का कहना था कि 'बच्चों को वैकल्पिक देखरेख में रखने का कारण केवल तभी बनता है जब उनके साथ उपेक्षा, हिंसा या विभिन्न तरीके से दुर्व्यवहार किया जाता है।' दर्शकों की उदासीनता के बावजूद 'श्रीमती चटर्जी बनाम नॉर्वे' फिल्म ने माता-पिता और चाइल्ड केयर सेवाओं के बीच चल रही कई कस्टडी लड़ाइयों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनमें से एक बर्लिन चाइल्ड सर्विसेस और शाह परिवार के बीच वर्तमान टकराव है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपनी जर्मन समकक्ष अन्नालेना बेयरबॉक के साथ चर्चा के दौरान दिसंबर, 2022 में यह मामला उठाया था। जयशंकर ने कहा-'हमें चिंता है कि बच्ची को उसके भाषायी, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक माहौल में होना चाहिए। यह उसका अधिकार है। हमारा दूतावास जर्मन अधिकारियों के सामने इस मामले को रख रहा है लेकिन यह एक ऐसा विषय भी था जिसे मैंने मंत्री के साथ चर्चा में उठाया था।'
सरकार के घरों में घुसने और बच्चों को दूर ले जाने के कारणों में से एक कारण बच्चों की परवरिश में सांस्कृतिक अंतर प्रतीत होता है। शाह बनाम जर्मनी मामले में यह मुद्दा उठाया गया है। जर्मनी से अपनी बेटी को वापस लाने के लिए संघर्ष कर रहे बच्ची के माता-पिता की ओर से दायर एक ऑनलाइन याचिका 'सेव अरिहा' में कहा गया है- 'जर्मन बाल सेवाएं बच्ची की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हैं। यह बच्ची एक कट्टर जैन परिवार से आती है। अरिहा शाह की उम्र दो साल से थोड़ी अधिक हैं। जर्मन चाइल्ड सर्विसेस उस पर मांसाहार के लिए जोर दे रही हैं। बच्ची ने अपनी उम्र का अधिकांश समय बर्लिन चाइल्ड सर्विसेस की निगरानी में बिताया है। जर्मन चाइल्ड सर्विसेस ने पिछले महीने अरिहा के माता-पिता धारा व भावेश शाह के माता-पिता के अधिकारों (पैरन्टल राईट्स) को समाप्त करने के लिए सिविल हिरासत का मामला दायर किया था। अरिहा को यौन शोषण के संदेह में संरक्षण में लिया गया था। परिवार का कहना है कि उसकी दादी की देखभाल के दौरान अरिहा को आकस्मिक चोट आई थी। उसे इलाज के लिए डॉक्टरों के पास भेजा गया था जिन्होंने चाइल्ड सर्विसेस को बुला लिया था। चिंतित माता-पिता ने ऑनलाइन याचिका में कहा है कि जर्मनी में कानून के 'निरंतरता सिद्धांत' का लाभ उठाते हुए चाईल्ड केयर इस मुकदमे को दो या तीन साल तक चला सकती है। इस सिद्धांत के तहत यदि किसी बच्चे ने राज्य द्वारा नियुक्त देखभालकर्ता के साथ महत्वपूर्ण समय बिताया है तो कहा जाता है कि बच्चे को वहां बसाया जाए और उसे माता-पिता के पास वापस स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए। भले ही वे पालन-पोषण करने के लिए योग्य पाए जाएं।
जर्मन राष्ट्रीय सांख्यिकी एजेंसी डेस्टैटिस के आंकड़े बताते हैं कि 2015-16 में 77645 बच्चे और युवा राज्य देखभाल में थे। 83 लाख से अधिक की आबादी वाले जर्मनी में 50364 बच्चे और युवा फैमिली फोस्टर केयर में रहते हैं। नॉर्वे में सरकार की निगरानी में 12000 बच्चे रहते हैं जो 55 लाख से अधिक की आबादी वाले देश के लिए एक बड़ा आंकड़ा है। बच्चों के अधिकारों को सबसे ऊपर रखने की नीति के कारण ये आंकड़े कई चिंताओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यूनिसेफ की एक नई रिपोर्ट के अनुसार 31 अमीर देशों के बीच स्वीडन, नॉर्वे, आइसलैंड, एस्टोनिया और पुर्तगाल अपनी राष्ट्रीय परिवार के अनुकूल नीतियों के आधार पर सबसे बेहतर सेवाएं प्रदान करते हैं। यह रिपोर्ट दो प्रमुख नीतियों पर केंद्रित है- माता-पिता के लिए चाइल्ड केयर लीव और स्कूल जाने के पूर्व बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन की शिक्षा व देखभाल। यह आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) तथा यूरोपीय संघ (ईयू) के घटक 41 उच्च एवं मध्यम आय वाले देशों में इन नीतियों की समीक्षा करता है। सबसे अधिक परिवार अनुकूल देशों में नॉर्वे ऐसा देश है जिसने 1981 में बच्चे के अधिकारों की रक्षा के लिए 'बाल लोकपाल' नियुक्त किया था।
फिर भी नॉर्वे को बाल कल्याण के मामलों की एक बड़ी संख्या का सामना करना पड़ता है और उनमें से अधिकांश माता-पिता द्वारा दायर किए गए हैं। इन पालकों ने अपना विरोध दर्शाने के लिए यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय का रास्ता खोज लिया है। न्यायालय ने मानवाधिकार सम्मेलन के केंद्रीय अनुच्छेद 8 का आधार लिया है जो निजी और पारिवारिक जीवन के लिए सम्मान के अधिकार को कवर करता है। हाल के वर्षों में यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राईट्स ने नॉर्वेजियन बाल कल्याण सेवाओं से जुड़े 39 मामलों को सुनवाई के लिए मंजूर किया है। कोर्ट ने जिन नौ मामलों पर फैसला सुनाया है उनमें से सात मामलों में पारिवारिक जीवन के अधिकार का उल्लंघन पाया गया है। अदालत के इतिहास में नॉर्वे के खिलाफ कुल 52 फैसले पारित किए गए हैं। फैसलों की इतनी बड़ी संख्या बाल कल्याण मामलों में पारिवारिक जीवन के अधिकार की रक्षा करने में नार्वे की विफलता को दर्शाती है।
बीबीसी के अनुसार नॉर्वेजियन मीडिया एक ऐसी स्टोरी की जांच कर रहा है जिसे उसने अनदेखा कर दिया है। मीडिया ने यह पाया है कि नॉर्वे में अन्य बच्चों की तुलना में एक विदेशी माता के बच्चों को उनके परिवारों से जबरन ले जाने की संभावना चार गुना अधिक है। सरकार ने नॉर्वे-चीन के एक दंपति पर अपने बच्चे की परवरिश को लेकर सवाल उठाए हैं जिसमें बच्चे के जन्म के बाद अपनी चीनी नानी के साथ बिताए गए समय को भी शामिल किया गया है। एशियाई देशों में बच्चों का अपने नाना-नानी या दादा-दादी के साथ समय गुजारना एक आम बात है।
आलोचकों का कहना है कि नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेस एजेंसी बार्नेवरनेट, आप्रवासियों के बच्चों को कस्टडी में लेने के लिए बहुत जल्दी में रहता है। 2011 में यौन शोषण के आरोपों के कारण एक चेक माता-पिता से दो बच्चों को एजेंसी ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। इस प्रकरण में माता-पिता को अंतत: दोषमुक्त कर दिया गया था, लेकिन सरकार ने बच्चों को वापस करने से इनकार कर दिया और अब उनके पालकत्व के अधिकारों को समाप्त कर दिया है। नॉर्वे में बाल कल्याण के कामकाज की चेकोस्लोवाकिया के पूर्व राष्ट्रपति मिलोस जेमन ने कड़ी आलोचना की। पोलैंड और रोमानिया के राष्ट्राध्यक्षों ने भी अपने नागरिकों से जुड़े मामलों में अपनी नाराजगी जाहिर की है।
पुराने दिनों में बच्चे को मारने के लिए उठाया हुआ हाथ या कठोर शब्द बच्चे के नखरे और उग्र व्यवहार को शांत कर सकते थे। कुछ देशों में जहां बच्चे के अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है वहां आज इस तरह कुछ करने के प्रयास को बच्चे के पालन-पोषण में चूक या 'हिंसाÓ के रूप में देखा जाता है। इस वजह से सरकार बच्चे को अपनी निगरानी में रख सकती है और आपके बच्चों की परवरिश में हस्तक्षेप कर सकती है। ऐसे कई मामले हैं जहां दंपतियों ने पाया है कि जिन तरीकों से उनकी अपने देशों में परवरिश की गई थी, उनके पालन-पोषण के तरीकों से बुनी गई परंपराओं, संस्कृति, धर्म और भाषाओं का मिश्रण था। वह पश्चिमी मानकों के एक अलग सेट को पूरा नहीं कर सकता है।
इस तरह की समस्याओं को हल करने में अक्सर सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। जैसे, खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासी श्रमिकों द्वारा उठाए गए मुद्दे। उदाहरण के लिए 2018 में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खाड़ी देशों का दौरा किया था तो श्रमिकों ने विशेष रूप से अपने देश से समर्थन की मांग की थी। विश्व में प्रवासी भारतीय सबसे बड़ी संख्या में हैं और धन प्रेषण के मामले में देश को सबसे अधिक योगदान देते हैं। ये लोग भारत सरकार के हस्तक्षेप के जरिए मेजबान देशों में नौकरी के सुरक्षा नियमों में सुधार की मांग कर रहे थे। प्रवासी श्रमिकों के लिए अधिनियमित कानूनों के माध्यम से बीमा का फिलीपीन मॉडल स्थापित करने के बारे में सुझाव दिए गए थे। प्रवासी श्रमिक और प्रवासी फिलिपिनो अधिनियम, 1995 तथा उसमें बाद में किए गए संशोधनों ने प्रवासी फिलिपिनो श्रमिकों को विनियमित भर्ती शुल्क, अनिवार्य बीमा और अन्य सामाजिक, आर्थिक तथा कानूनी सहायता सुनिश्चित की है।
यदि केंद्र सरकार विशेष रूप से नॉर्डिक और यूरोपीय देशों में भारतीय दूतावासों के माध्यम से परामर्श और सहायता प्रदान करके हस्तक्षेप करती है तो इस कानून के आधार पर विदेश में काम करने वाले परिवारों के मामले में मदद मिल सकती है। भारतीय माता-पिता के लिए दूतावासों में एक प्रकार का पारिवारिक लोकपाल एक मार्गदर्शक तथा रेफरल बिंदु हो सकता है ताकि चाईल्ड वेलफेयर सर्विसेस को घरों में घुसने से रोका जा सके क्योंकि इनकी दखलंदाजी से मिले अनुभव अच्छे नहीं हैं। (लेखिका दी बिलियन प्रेस की प्रबंध संपादक हैं। सिंडिकेट: दी बिलियन प्रेस)